Wednesday, 6 May 2020

आज कल कुछ फ़ुरसतें ज्यादा सी हैं

आज कल कुछ फ़ुरसतें ज्यादा सी हैं,
तो ग़ौर किया मैंने कि यूँ ही कभी तुझे देखकर जो मैं मुस्कुरा दूँ ,
तो तु चौक्कन्ना सा हो जाता है।
कभी मेरी हँसी गूँजे तो,
तु कनखियों से मेरा चेहरा पढ़ता है।
आज कल कुछ फ़ुरसतें ज्यादा सी हैं,
तो देखा है मैंने कि कभी मेरे कौतुकों पर,
सामान्य से ज्यादा देर मुझे देखता है।
कभी मेरी बकबक पर,
चोरों सा कान धरता है।
आज कल कुछ फ़ुरसतें ज्यादा सी हैं,
तो मुझको यूँ लगता है,
तू कुछ बदला बदला सा है।
कभी यूँ लगता है तू ऐसा ही था..... मैंने देखा ही नहीं,
शायद तू देख रहा था पर मैंने देखा ही नहीं।
आज कल कुछ फ़ुरसतें ज्यादा सी हैं,
तो बैठे बैठे तुझे तलाशने निकल पड़ती हूँ,
कुछ दूर ही चलती हूँ, फिर थकने लगती हूँ।
आज कल कुछ फ़ुरसतें ज्यादा सी हैं,
तो मुआयना किया कि हर बार नयी राह पर तुझे तलाशती आयी हूँ,
आज हिसाब लगाया तो लगा,
तेरी सी राह पे चलती,
तो शायद तुझे पा ही लिया होता।
आज कल कुछ फ़ुरसतें ज्यादा सी हैं,
तो बैठे बैठे तुझे बड़ी देर निहारा मैंने,
तू जान न सके, इसलिए ज़रा एहतियात से निहारा मैंने।
कुछ तलाश रही थी तुझमें,
पर तुझे देखते देखते खुद खो सी गयी।
आज कल कुछ फ़ुरसतें ज्यादा सी हैं,
तो कभी हमें भी तलाश लेती हूँ।
बस साये से दिखते  हैं...
कहीं तेरे.....
कहीं मेरे.....
कभी क़दमों का फ़ासला होता है,
कभी मीलों की दूरी दरमियाँ।
आज कल कुछ फ़ुरसतें ज्यादा सी हैं,
तो कभी तू बदला लगता है,
कभी बस वैसा ही...
कभी सोचती हूँ कुछ गुफ़्तगू  के घुँघरू बिखेरूँ कमरे के फ़र्श पे,
कि तू फिसले और कुछ बाते हों पनाहों में...
मगर बस सोचती हूँ...
आज कल कुछ फ़ुरसतें ज्यादा सी हैं,
तो दिल ज़्यादा हसस हो चला है,
न जाने ये नादाँ क्या क्या चाहता है...
आज कल कुछ फ़ुरसतें ज्यादा सी हैं,
तो मैं भी मदहोश सी दिल की सुन लेती हूँ।
दिल कहता है वो अब भी कुछ कुछ मेरा है,
मैं सुन लेती हूँ।
ज़रा सा खुश हो लेती हूँ...
आज कल कुछ फ़ुरसतें ज्यादा सी हैं,
कुछ लम्हे तेरे पहलु में... तुझसे छुप कर ही सही..... जी लेती हूँ।












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