कितने बोझिल हो गए ये रिश्ते,
न मोह रहा... न यकीन...
बस शिकवों के ढेर लगे हैं...
ख़ाली ख़ाली सी हथेली पर वक्त थपकी देता है...
जिन उंगलियों के बीच एक हाथ का संचा ढलता था...
वो रिक्त सा हाथ मेरा अब मुठ्ठी में लम्हे बटोरे बैठा है...
मैं लाख मनाउँ खुद को पर...
जो टुट गया वो क्या फिर जुड़ता है...
वो कहते हैं रिश्ता न देख, बस नफ़ा नुकसान का मान लगा...
उससे मोह की नीलामी में मैंने भी दाम लगा डाला...
जो भी कुछ दरमियां बाकी था वो मुहरों में मढवा डाला...
बड़ी टीस सी पल पल उठती है...
कुछ खोया मैंने इस फ़हरिस्त में...
अब हर चीज़ रंग लाल है...
कुछ दिल क् खून में डूबा है....
कुछ आखों के आकरोश में जलता है...
सब ख़ाख हुआ... बस हम तुम हैं...और इस रिश्ते का नाम ही बस बाकी है...