Friday, 22 June 2018

अब हम लड़ते नहीं,
अब रूठते नहीं,
अब नाराज़गी नहीं होती दरमियाँ,
ना खाने से बैर होता है,
ना नींद से शिकायत,
ना मानाने की फ़िक्र,
ना मनाए जाने की तलब,
बातों पर अब लिहाज़ की लगाम नहीं होती,
गिले शिकवों के बहिखाते खुले हीसाबों के हवाले होते हैं,
अब बहाने नहीं होते,
बस सीधे निशाने होते हैं,
अब आपसी अनबन से बड़े मसले भी होते हैं,
बातें बंद थीं ये तो हम कभी कभी भूल ही जाते हैं,
अब न दर्द होता है,
ना दिल रोता है,
ना अफसोस होता है,
ना ए काश! का अरमान होता है,
अब गाने भी कुछ ज़हीन से ही पसंद आते हैं,
प्रेम कहानी छलावा सी लगती हैं,
अब गुस्सा नहीं आता तुम्हारी हरकतों पे,
जनतीं हूँ क्या हासिल होगा खून जला के,
मज़ा आता है  तुम्हारे कहने से पहले ही तुम्हारे तर्क देने में,
मज़ा आता है तुम्हारे नाटकों का पर्दा क्लाइमैक्स से पहले ही गिराने में,
अब हम सच में लड़ते नहीं हैं,
बस एक दूसरे का हीसाब चुकता करते हैं,
यूँ कि अब शादी पुरानी हो गई,
कुछ तुम्हें मेरी.... कुछ मुझे तुम्हारी आदत हो गई ।