Tuesday, 13 October 2015

एक बरस बीत गया … हाथों से रेत सा रीत गया ……कुछ यादें बाकी हैं ...... कुछ दर्द बाकी हैं ......


मैं तुम्हे भुलाना नहीं चाहती ,
तुम्हे ज़ेहन से मिटाना नहीं चाहती ,
बस तुमसे उबरना चाहती हूँ ,
तुम्हारी विदा से सम्भालना चाहती हूँ। 

तुम्हारा जिक्र आज भी मेरी आँखें नम करता है ,
ये खालीपन आज भी मुझे छल्ली करता है ,
पर मैं तुम्हे मीठी याद में संजोना हूँ,
तुम्हें याद कर के मुस्कुराना चाहती हूँ। 

मैं तुम्हे भुलाना नहीं चाहती ,
तुम्हे ज़ेहन से मिटाना नहीं चाहती ,
बस तुमसे उबरना चाहती हूँ ,
तुम्हारी विदा से सम्भालना चाहती हूँ। 

तुम्हारे सबक जीवन में ढालना चाहती हूँ,
इस नुक्सान से मज़बूत बनना  चाहती हूँ।

मैं तुम्हे भुलाना नहीं चाहती ,
तुम्हे ज़ेहन से मिटाना नहीं चाहती ,
बस तुमसे उबरना चाहती हूँ ,
तुम्हारी विदा से सम्भालना चाहती हूँ।

अब तुम्हारा नाम लेकर अश्क़ न आये मेरी आँखों में,
अब तुम्हे याद कर के दर्द न हो सीने में,
तो तुम इसे मेरा धोखा न समझना,
तुम इसे मेरी बेफिक्री न समझना।

मैंने नयी राह ली है,
पर उस पड़ाव पर तेरी मज़ार बना ली है,
तुझे बिसराया नहीं मैंने , बस खुद में समेट लिया है,
बस तू ये शरीक-ए -जेहन रख की  ,

मैं तुम्हे भुलाना नहीं चाहती ,
तुम्हे ज़ेहन से मिटाना नहीं चाहती ,
बस तुमसे उबरना चाहती हूँ ,
तुम्हारी विदा से सम्भालना चाहती हूँ।

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